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» » » Mantra our Stuti Mahamrityunjay Mantra, Bhajan, Rudrashtakam, Lingashtakam, Shiv Tandava Stotram (मंत्र और स्तुति महामृत्युंजय मंत्र, प्रसिद्ध भजन, रुद्राष्टकम, लिंगष्टकम्, शिव ताण्डवस्तोत्रं)

Mantra our Stuti Mahamrityunjay Mantra, Bhajan, Rudrashtakam, Lingashtakam, Shiv Tandava Stotram
भगवान शिव बड़े ही दयालु कृपालु वह घट-घट की जानते हैं। मनुष्य के जीवन में न जाने कितने प्रकार के कष्ट होते हैं, विपदाएं होती हैं और इन सब कष्ट और विपदाओं का निवारण भी है अच्छे कर्म सत्कर्म और भगवान की भक्ति। ऐसे ही मंत्र और स्तुति जो पुरातन काल से चली आ रही है जिनके वर्णन से, भजन से कष्ट और पाप मिट जाते है।
मंत्र और स्तुति ( Mantra our Stuti )
mantra our stuti


- मंत्र और स्तुति ( Mantra our Stuti )
  • महामृत्युंजय मंत्र ( Mahamrityunjay)
  • प्रसिद्ध भजन ( Bhajan )  
  • रुद्राष्टकम ( Rudrashtakam )
  • लिंगष्टकम्  ( Lingashtakam )
  • शिव ताण्डवस्तोत्रं (Shiv Tandava Stotram )*
 ॐ मृत्युंजय महादेव त्राहिमां शरणागतम
जन्म मृत्यु जरा व्याधि पीड़ितं कर्म बंधनः

- महामृत्युंजय मंत्र Mahamrityunjay Mantra जिससे मृत्यु के मुंह से भी वापस आया जा सकता है, ऐसा पुराणों में विदित है जो मनुष्य इस मंत्र का जब करता है उसके ऊपर (भगवान शिव) महादेव महाकाल की असीम कृपा होती है।

महाशिवरात्रि संपूर्ण पूजन विधि व शुभ मुहूर्त Maha shivratri sampoorna pujan vidhi evem muhurt ⇓⇓⇓⇓⇓⇓⇓⇓⇓

  • "महामृत्युंजय मंत्र" Mahamrityunjay Mantra
'ह्रीं जूं सः भूर्भुवः स्वः,
त्रिमब्कं स्यजा महे
सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्।
उर्वविरुममिद्ध बंधनान्नमत्रीयोर्म्मुक्षिमामृतात
स्वः भुवः भूः सः जूं हौं '

- भगवान शिव महादेव का भजन Bhajan यह बहुत ही प्रचलित और प्रसिद्ध भजन है जिनको आपने गीतों में भी सुना होगा।
  • "प्रसिद्ध भजन"Bhajan
शीश गंग अर्धांग पार्वती सदा विराजत कैलासी।
नंदी भृंगी नृत्य करना है, गुणभाक शिव का दासी।।

सीतल मद्सुगुंध पवन बाहे बैठी है शिव अविनाशी।
करत गान गन्धर्व सप्त सुर, राग - रगनी सब गासी ।।

अक्षय रक्षक भैरव जां डोलत बोल रहा है कई वासी।
कोयल शब्द सुनवाई सुन्दर, भ्रमकारी करत है गुन्जासी ।।

कल्प वृक्ष अरु पारिजात लग रहे हैं लक्षासी।
सूर्य कांति सम पर्वत शोभित, चन्द्रकन्ति नव मीमासी ।।

छहों ऋतु नित पलट फुलट है पुष्प चढ़ाई है वर्षा सी।
देव मुनी जन की भीड़ पठत, निगम रहत जो नितगीसी ।।

ब्रह्मा विष्णु जाको ध्यान धरत है, कछू शिव हमको परमसी।
ऋद्धि-सिद्धी के दाता शंकर, सदा आनंदित सुखरासी ।।

जिनके सुमिरन सेवा कर टूट जाये यम की फांसी।
त्रिशूल फरासा का ध्यान निरंतर, मन लगाये कर जो ध्यासी ।।

दूर करे विपदा शिव तिनकी जन्म सफलतापूर्वक शिवपॉडपास।
कैलाशी काशी के वासी, अविनाशी सुध मेरी लिज्यो।।

सेवक जान सदा चरन को अपनी जान देस दीज्यो।

तुम पर प्रभु सदा सीना, अवगुण मेरे सदा ढक्कियो।

सब अपराध माफ कर शंकर किंकर की विनती सुनियो।।
                      : स सम्पूर्णम् :


भगवान शिव को प्रसन्न करने के सरल 5 उपाय


- श्री रामचरित्र मानस (रामायण) श्री तुलसीदास ने रुद्राष्टकम Rudrashtakam का वर्णन किया है, जिसमें भगवान
शिव भोलेनाथ की स्तुति है इसको पढ़ने से कष्टों और पाप का नाश होता है और जीवन में तरक्की- सफलता मिलती है।*
  • "रुद्राष्टकम" Rudrashtakam
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभूं व्यापक रूप ब्रह्वेवेद रूपम।
निजं नर्गगुण नर्वविपण अहिहं चिदाकाशमाकाशवास भजेमम् ॥1॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरिन्गोष्टमीशं गिरीशम्।
कराल महाकालकाले कृपाला। गुनागेरसासरपार नॉटोम॥2॥

तुशारादिसंकागुरं गंभीर मनोक्तकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
फर्शनमौलिकलोलिनी चारुगङ्गा लसद वालाबाबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥3॥

चलत् क्वंडे भूसुदुनेत्रं विस्ला। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालम्।
मृगशशर्मामबरं मुंडमाला। प्रियं शङ्करं सबनाथं भजामी ॥4॥

प्रचण्ड प्रचीं प्रगल्भ परेशस अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्रिएक: शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेहं भवानीपति कं॥5॥

कलाथीकल्याण कल्पान्तिकारी सदा सज्जनानन्ददार पुरारी
चिदानन्दसंदोह मोहापहार प्रसीद प्रसीद पार्वो मन्मथारी॥6॥

न यवद उमानाथपादारविन्दं भजन्तिह लोके परे वा नाराणाम।
न तावत्सुख शान शान्ति संतापनाशं प्रसीद पार्वो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानेमी योगी जपं नेव पूजन्। नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतभ्यम।
जराजन्दुदुःघाघ तात्प्यमानं प्रजो देख आपमानामीश शंभो॥8॥

रूद्रातकमीदं प्रॉटकम् विप्रेशन हरतोषेये
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥9॥
          : इति श्री रुद्राष्टकम् सम्पूर्णम् :


- भगवान शिव के लिंगष्टक Lingashtakam का पाठ करने से विशेष कृपा भगवान शिव की आप पर रहेगी। कामयाबी, सफलता की बुलंदियों तक पहुंचेगे।
  • "लिंगष्टकम्" Lingashtakam
संचित पाप अनशन लिंगं, दिनकर करोड़ प्रभाकर लिंगं।
तत्प्रणामामी सदाशिव लिंगं ॥1॥

देवमूनिप्र्वाराचालालिङ्गम् कामदहम् करुणकर लिङ्गम्।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गम ते प्रणमामी सदाशिव लिन्ग्म् ॥2॥

सर्वसुगंधधिसुलेपितलिङ्गम् बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गम ते प्रनमामी सदाशिव लिङ्गम् ॥3॥

कनकमामानीभूषित लिङ्गम् फनिपिटिवष्टित शोभित लिङ्गम्।
दक्षसूयज्ञ विनाशन लिङ्गम ते प्रणमामी सदाशिव लिन्ग्म॥4॥

कुङ्कुमचन्दनलेप्टीलिङ्गम पङ्कजहासुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चपपविनाशनलिङ्गम ते प्रणमामी सदाशिव लिङगम॥5॥

देवगानार्चित सेवितलिङ्गम् भावभाव भक्तिभरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गम ते प्रनमामी सदाशिव लिङ्गम॥6॥

अष्टडलोप्रिविपचारणलङ्गम् सर्वसमुद्भगकारणलिङ्गम्।
अष्टदर्दि्रविनाशितलिङ्गम ते प्रनमामी सदाशिव लिङ्गम॥7॥

सुरगुरसुरुवरपूजित लिङ्गम् सुरवनपुशप सदार्चित लिङ्गम्।
परातापरं परमात्मक लिङ्गम ते प्रनाममामी सदाशिव लिङ्गम ॥8॥

लिङ्गाटेकमिदं पुण्यं यः पठत शिवसन्निधौ।
शिववममवप्तोती शिवेन सह मोदते॥9॥
 : इति श्री लिंगष्टक सम्पूर्णम् :

शिव जी का ये महामंत्र दुनिया के सारे कष्टों से बचाएगा Shiv Ji Ka Maha Mantra



- यह रावण द्वारा रचित प्रसिद्ध Shiv Tandava Stotram शिव स्तुति है जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने रावण को वरदान दिया था। मनोकामना पूर्ण करने के लिए और कष्टों के निवारण के लिए इस स्तुति का पाठ करना चाहिए।
  • "शिव ताण्डवस्तोत्रं " Shiv Tandava Stotram
जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥1॥

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥2॥

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥4॥

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥6॥

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥16॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

: इति शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् :

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