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» » Karma Our Bhagya In Dono Mein Kaun Shresth Hai is Baat ki Duvidha Ko Dur Karti Hai Bhagavad Gita | कर्म और भाग्य इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है इस बात के दुविधा को दूर करती है भगवत गीता|

Karma Our Bhagya In Dono mein kaun shresth hai is baat ki duvidha Ko dur Karti Hai Bhagavad Gita 

Karma Our Bhagya In Dono के ही अपने-अपने मतलब हैं। इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं जो Karma किए बिना रह सके। वह चाहे अथवा ना चाहे, उसे कर्म तो करना ही पड़ता है।Karma से Bhagya उत्पन्न होता है, Bhagya कर्म उत्पन्न नहीं करता।

(Who is the best in karma and destiny(luck)? There is an explanation of karma in the Bhagavad Gita.)

Karma Our Bhagya In Dono Mein Kaun Shresth Hai is Baat ki Duvidha Ko Dur Karti Hai Bhagavad Gita
MahaBharat
इस संसार में जीवन जीने के लिए, जीवन को समझने के लिए कई बातों का होना आवश्यक है।

यह समझना आवश्यक है कि जीवन में सफलता-असफलता, दुख और सुख, ज्ञान, अज्ञान, जीवन-मृत्यु ये सभी जीवन के जरूरी पहलू हैं।

सभी तरह की बातों का मिश्रण है जीवन। जीवन में कई तरह की परेशानियों के साथ, सुखों का भी अनुभव होता है, यही तो जीवन है।

Bhagya के भरोसे बैठने वाले व्यक्ति को जीवन में केवल कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि जो व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठे होते हैं। वह कर्म से विमुख हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का जीवन बड़ी कठिनाइयों में व्यतीत होता है।
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अगर उसे भाग्य से कुछ मिल भी जाता है, तो वह कितने समय तक उसके साथ रहेगा। कोई भी वस्तु, धन हमेशा के लिए एक ही जगह स्थित नहीं होता। जरूरतों का चक्र निरंतर चलता रहता है, इसीलिए इससे उसका काम कुछ सालों के लिए चल सकता है, पर जीवन भर नहीं।


यदि उसके भाग्य में कुछ भी नहीं, तो एक वक्त की रोटी के लिए भी उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। दूसरों की दया पर आश्रित होना पड़ेगा। नाकारा, निकम्मा बनकर दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ेगा। ऐसा जीवन व्यर्थ का जीवन है, इसलिए आदमी को कर्महीन नहीं होना चाहिए।
(Karma Our Bhagya In Dono mein kaun shresth hai is baat ki duvidha Ko dur Karti Hai Bhagavad Gita)

ईश्वर ने उसे सबसे बड़ी दौलत, उसके स्वस्थ शरीर के रूप में उसे प्रदान की है। तो उसका सदुपयोग करके कर्म करना चाहिए।
कर्म पर विश्वास रखने वाले
निरंतर परिश्रम करने वाले
प्रयास करने वाले व्यक्ति
जीवन में आने वाली असफलताओं और दुखों से ना डरने वाले व्यक्ति
जीवन में अनेकों असफलताओं के बाद भी, जरूर सफलता हासिल करते है। उनकी लग्न और उसके प्रयास, उसके भाग्य को बनाते हैं।

हो सकता है इसमें विलंब हो, परंतु कर्म का फल मिलता ही मिलता है। समय अधिक लग सकता है, पर ऐसा कभी नहीं होता कि इंसान कर्म करें और उसका फल उसे ना मिले।

कर्म करने वाले व्यक्ति को फल की आशा नहीं करना चाहिए। उसे केवल और केवल कर्म करना चाहिए। फल की आशा करने वाला व्यक्ति निराशा में डूब जाता है।

इसलिए केवल कर्म करो, क्योंकि आप यह जानते होंगे। जो भी कार्य आप करते हैं, चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो, उसका फल मिलता ही मिलता है। यह कब मिलेगा, इसका समय कोई भी निश्चित नहीं है।

भाग्य को अच्छा बनाना और भाग्य को बदलने का केवल और केवल एक ही रास्ता है, वह है कर्म। जितने अच्छे कर्म इंसान करता है, उसका भाग्य भी उतना ही उज्जवल होता है। कर्म में इतनी शक्ति होती है कि वह अपने भाग्य को बदल सके, भाग्य का निर्माण कर सके। इसलिए इंसान को निरंतर अपने कर्म को करते रहना चाहिए।

भगवान श्री कृष्ण के द्वारा महाभारत युद्ध के समय कुरुक्षेत्र में अर्जुन को समझाने के लिए भगवत गीता के उपदेश दिए गए। भगवत गीता में कुल 700 संस्कृत भाषा में छंद है। जो कि 18 अध्ययाओं में लिखित है। जिनको तीन वर्गों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक में 6 अध्याय हैं और महाभारत का युद्ध भी 18 दिन चला था। जिसमें जीवन की हर कठिनाइयों और परेशानियों का हल है। जो व्यक्ति भगवत गीता का अनुसरण करता है। उसके जीवन की सारी कठिनाइयां समाप्त हो सकती है।

भगवत गीता का श्लोक -
Bhagwat Geeta Shlok Bhagwan Krishna aur Arjun
Bhagwat Geeta Shlok

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

भावार्थ : निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता। क्योंकि सारे मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता। वह इस समाज और प्राकृतिक जनित गुणों द्वारा कार्य करने के लिए बाध्य होता है।

जब हमें कर्म करना ही है, तो फिर दुखी होकर कोई भी कार्य करने का क्या लाभ। जीवन में कर्म से पीछे नहीं भागना चाहिए। कर्म करने से सफलता मिले अथवा ना मिले। पर हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

जिस तरह इस श्लोक में बताया गया है कि मनुष्य को कर्म तो करना ही पड़ता है। वह चाहे अथवा ना चाहे इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है। जिसने जो कार्य किया हो, उसे उसका फल ना मिला हो।

किसी को बड़ी सफलताएं मिलती हैं और किसी को छोटी सफलता।

कोई व्यक्ति बार बार हारने के बाद भी एक बार जीत जरूर प्राप्त करता है। पर जो व्यक्ति कर्म करके तुरंत फल की आशा करता है। वह व्यक्ति दुखी होता है। क्योंकि किसी भी कार्य को करने पर उसका फल तुरंत मिले, यह आवश्यक नहीं। उसमें समय लग सकता है, तो चिंता करने की वजह चिंतन करना चाहिए। जब भी जीवन में असफलताएं मिले, तो उनसे सीखना चाहिए। कि हमारे द्वारा कौन सी कमियां रह गई है, जिन्हें हम सही करें और सफलता हासिल करें।

भगवत गीता का श्लोक -
(Karma Our Bhagya In Dono mein kaun shresth hai is baat ki duvidha Ko dur Karti Hai Bhagavad Gita)

कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन।
माँ कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

भावार्थ : कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर कभी नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा तेरा कर्म ना करने में भी कोई आसक्ति न हो।

कर्म करना हमारा अधिकार है और जरूरत भी। क्योंकि बिना कर्म किए हमारा निर्वाह भी नहीं हो सकता।
जिस तरह किसी भी परीक्षा में पास होने के लिए या प्रथम आने के लिए उसके प्रश्न का जवाब देना पड़ता है। उसी तरह हमें जीवन में सफलता और अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर्म करना पड़ता है।

जब हम कोई प्रश्न का उत्तर लिखते हैं तो उसको स्वयं नहीं जांचते। उसको शिक्षक जांचते है। वही तय करता है कि आप अपने सहपाठियों में कितने श्रेष्ठ है।  
जो जिस तरह के उत्तर देता है उन्हें उसी क्रम अनुसार पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवा स्थान प्राप्त होता है और जो सही उत्तर नहीं दे पाता वह फेल हो जाता है उसे पास होने के लिए पुनः प्रयास करना पड़ता है वह तब तक प्रयास करता है जब तक उसे सफलता ना मिले यही जीवन है हम इसमें ईश्वर या अपने भाग्य को दोष नहीं दे सकते क्योंकि कर्म करने वाले हम स्वयं हैं जैसे कर्म हम करते हैं वैसा ही भाग्य बनता है वैसा ही फल मिलता है।

ऐसा कार्य जिसको करने में मन ना हो उस पर आपकी दिलचस्पी ही ना हो उसे बिना मन के करने से कोई भी लाभ नहीं उसमें केवल हानि है उस में अनेकों गलतियां हो सकती हैं समय खराब होगा साथ में ऐसा कार्य आपको सफलता की जगह असफलता देगा इसलिए जिस कार्य को भी आप करें उसको रुचि से करें उस में खुशी होना चाहिए और पूरा मन उस कार्य में लगना चाहिए ऐसे कर्म से भाग्य उज्जवल होता है और सफलताएं मिलती है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥

भावार्थ :  तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

जीवन को चलाने के लिए जो भी कार्य आवश्यक होते हैं। उन्हें करना ही पड़ता है।
इसलिए कभी भी किसी भी कार्य से डरना नहीं चाहिए।
उस कार्य को आप जितने अच्छे से कर सकते हैं, उसे करना चाहिए।
जीवन में कई बार परिस्थितियां बिगड़ जाती है। पर उन परिस्थितियों से डरने की अपेक्षा उनसे लड़ना चाहिए। कर्म ना करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। अगर आप कर्म नहीं करेंगे, तो आपका भाग्य और कमजोर होता जाएगा। वह एक ऐसा पल जो आपकी किस्मत बदल सकता है।
वह आपसे दूर जा सकता है, उस पल को प्राप्त करने के लिए कर्म करना ही पड़ता है।

कर्म और भाग्य इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है-
(Karma Our Bhagya In Dono mein kaun shresth hai is baat ki duvidha Ko dur Karti Hai Bhagavad Gita)

मनुष्य के पास कर्म करने की शक्ति होती है, परंतु वह भाग्य को अपने अनुकूल नहीं कर सकता।
अगर वह भाग्य को अपने अनुकूल करना भी चाहता है। तब भी उसे कर्म का सहारा लेना ही पड़ता है।
कर्म से भाग्य को बनाया जा सकता है। कर्म करके भाग्य को उज्जवल बनाया जा सकता है। और भाग्य को यूं ही बैठे हुए प्राप्त करना मुश्किल होता है।


जैसे दो व्यक्ति एक गड्ढे को खोद रहे थे। तो उसमें से एक व्यक्ति ने कहा कि भाई अब मैं यह काम नहीं करूंगा। गड्ढा तो हम खोद रहे हैं, पर पानी तो सब पिएेंगे।
पर दूसरा व्यक्ति बोला भाई यह पुण्य का काम है। अगर इससे और लोगों की भी प्यास बुझेगी, तो इसमें क्या बुराई है।
लोग कम से कम हमें याद तो करेंगे। पर दूसरा व्यक्ति नहीं माना और वहां से चला गया।
वह व्यक्ति निरंतर गड्ढा खोदता रहा, उसने कहा जब तक इससे पानी नहीं निकलेगा। मैं यह कार्य रोज ऐसे ही करता रहूंगा।
उसके गड्ढे खोदने से उसमें एक घड़ा निकला। जब उस व्यक्ति ने घड़े को खोला तो उसमें सोने की के ढेर सारे सिक्के और जवाहरात थे।
जिसे देख कर वह बहुत ही खुश हुआ और उस धन को ले जाकर उसने स्वयं की और अन्य जरूरतमंद लोगों की मदद की।
यहां पर दो व्यक्तियों की बात हुई। एक व्यक्ति वह है जो कर्म से दूर भागा। और एक व्यक्ति वह है, जिसने निस्वार्थ होकर कर्म किया।
जिस व्यक्ति ने निस्वार्थ होकर कर्म किया, उसका भाग्य खुल गया।
और जिस व्यक्ति ने स्वार्थी होकर कार्य को छोड़ दिया, उस व्यक्ति का भाग्य भी उससे दूर रहा।
जब तक आप निस्वार्थ कर्म नहीं करेंगे, तब तक भाग्य उज्जवल होना बेहद ही मुश्किल है।
Bhagwat Geeta Shlok Krishna aur Arjun Mahabharat
Bhagwat Geeta Shlok Bhagwan Krishna aur Arjun
इस बात की चिंता किए बिना कि मैं जो भी कार्य कर रहा हूं, उसका फल कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, कितना मिलेगा, जल्दी मिलेगा या नहीं।
इन सबकी बातों में अपने समय को खराब करने से अच्छा है, कि कर्म करें, अच्छे कर्म करें।
जिनसे स्वयं का, समाज का, इस प्रकृति का फायदा हो।
तब स्वयं ही भाग्य उज्जवल हो जाता है। भाग्य कब, कैसे, किसका चमक जाएं। यह नहीं कह सकते।
इसलिए भगवत गीता में कहा गया है।
कर्म कर, फल की चिंता मत कर।
इसलिए कर्म श्रेष्ठ है, कर्म में इतनी शक्ति होती है कि वह आपके भाग्य को उज्जवल कर सकता है।
अलग-अलग व्यक्तियों की, अलग-अलग धारणाएं, कोई भाग्य को श्रेष्ठ कहता है। कोई कर्म को श्रेष्ठ।
पर मनुष्य के हाथ में कर्म करने की शक्ति होती है। भाग्य को प्रकट करने की शक्ति नहीं।
जब ईश्वर ने हमें कर्म करने की शक्ति प्रदान की है। तो हम भाग्य के पीछे क्यों भागते हैं, हम क्यों परेशान होते हैं, हमें तो केवल कर्म करना चाहिए। वह भी खुश होकर, जिससे जीवन का निर्वाह आसानी से हो सकें।
जरूरी नहीं कि जीवन में हर सुख सुविधाएं प्राप्त हो, सबसे बड़ी दौलत होती है खुशी।

हर समस्या का समाधान होता है, बस उस समस्या से निपटने के लिए आत्ममंथन, चिंतन करना जरूरी है।
भाग्य को अपने बस में करना बहुत ही मुश्किल है। पर अपने भाग्य को सुधारना कर्म के हाथ में है।
कैसी भी परिस्थितियों में अगर आप मुस्कुराते हुए अपने कर्म को निरंतर करते रहते हैं। तो आपके भाग्य को भी मजबूर होना पड़ेगा आपके लिए।

"Karma Our Bhagya In Dono Mein Kaun Shresth Hai is Baat ki Duvidha Ko Dur Karti Hai Bhagavad Gita | कर्म और भाग्य इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है इस बात के दुविधा को दूर करती है भगवत गीता|"

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